त्रिकोणमिति

त्रिकोणमिति, गणित की एक शाखा है जिसमें त्रिभुजों और उनसे बनने वाले बहुभुजों का अध्ययन किया जाता है । शब्द 'Trigonometry' की व्युत्पत्ति ग्रीक शब्दों 'Tri' (जिसका अर्थ है तीन) 'Gon' (जिसका अर्थ है भुजा) और 'Metron' (जिसका अर्थ है मापना) से हुई है।
अतः "Trigonometry' का शाब्दिक अर्थ त्रिभुज की भुजाओं और कोणो का मापना है। मूलतः त्रिकोणमिति को गणित की वह शाखा माना जाता था जो त्रिभुज की भुजाओं और कोणों को मापने से सम्बन्ध रखती है।
इसका अनुप्रयोग खगोलशास्त्र, भूगोल, सर्वे, इन्जीनियरिंग तथा नेवीगेशन में होता है। प्राचीन काल में खगोलविद् त्रिकोणमिति का प्रयोग पृथ्वी से तारों और ग्रहों की दूरियाँ मापने में करते थे। आजकल इंजीनियरिंग में प्रयुक्त अधिकांश प्रौद्योगिकीय उन्नत विधियाँ त्रिकोणमिति संकल्पनाओं पर आधारित हैं।
त्रिकोणमिति में त्रिभुजों की भुजाओं और कोणों के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है ।
त्रिकोणमिति में समकोण त्रिभुज का अध्ययन सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है ।
इस विज्ञान के विषय में प्रथम बार जिक्र हिप्पार्कस् (140 ई.पू.) ने किया जब उसने कहा कि पहुंच से बाहर की वस्तुओं की दूरी तथा ऊँचाई ज्ञात की जा सकती है।
उसके कुछ वर्ष बाद 150 ई. में टौलेमी ने भी इसी प्रकार उसे समकोण त्रिभुज की सहायता से करने की संभावना जताई।
परन्तु वह आर्यभट्ट (476 ई.) थे जिन्होंने प्रथम बार ज्या शब्द का प्रयोग किया जिसे बाद में साईन (sine) कहा गया।
इस कार्य को भास्कराचार्य (1114 ई) ने अपने गोलाध्याय की रचना करके आगे बढ़ाया। इसमें उन्होंने ज्या, कोटिज्या तथा स्पर्शज्या का प्रयोग साईन (sine), कोसाईन (cosine) तथा स्पर्शज्या (tangent) अनुपातों के लिए किया परन्तु इस कार्य का पूर्ण श्रेय नीलकंठ सोमसुत्वन (1500 ई.) को जाता है
जिन्होंने इस कार्य में उन्नयन और अवनमन का प्रयोग करके ऊँचाई तथा दूरी से संबंधित कुछ प्रश्न हल किए।
एक समकोण त्रिभुज के न्यूनकोण के त्रिकोणमितिय अनुपात
मान लीजिए एक समकोण ∆ABC में, ∠B समकोण है। यहाँ ∠A (अर्थात ∠CAB) एक न्यून कोण है, AC कर्ण है, भुजा BC, ∠A के सामने की भुजा (सम्मुख) तथा भुजा AB, ∠A की आसन्न भुजा है।
पुनः, यदि हम ∠C पर विचार करें, तो भुजा AB, ∠C के सामने की भुजा है तथा भुजा BC, ZC की आसन्न भुजा है।
त्रिकोणमिति में समकोण त्रिभुज
जिस त्रिभुज का एक कोण समकोण हो, उसे समकोण त्रिभुज कहा जाता है. जिसमे दो कोण न्यूनकोण होते है।
1. कर्ण (K): समकोण त्रिभुज में समकोण के सामने की भुजा को कर्ण कहते है. अथवा, समकोण त्रिभुज में सबसे बड़ी भुजा को कर्ण कहते है।
2. लम्ब ( L ): समकोण त्रिभुज में न्यूनकोण के सामने की भुजा को लम्ब कहते है।
3. आधार ( A ): समकोण त्रिभुज में न्यूनकोण बनाने वाली भुजा को आधार कहते है।
समकोण त्रिभुज में कर्ण स्थिर होता है, लेकिन लम्ब और आधार अपना स्थान बदलते रहते है ।
sin θ = लंब/कर्ण
cos θ = आधार/कर्ण
tan θ = लम्ब/आधार
cosec θ = कर्ण/लंब
sec θ = कर्ण/आधार
cot θ = आधार/लंब
उपरोक्त त्रिकोणमितिय अनुपातों को हम संक्षेप में क्रमशः sin A, cos A, tan A, cosec A, sec A और cot A द्वारा व्यक्त कर सकते हैं।
नोटः sin 0 तथा cosec 0 एक दूसरे के व्युत्क्रम (प्रतिलोम) हैं। इसी प्रकार, cot 0 तथा sec 0 क्रमशः tan 0 तथा cos0 के प्रतिलोम हैं।
sinθ = 1 / cosecθ,
cosecθ = 1 / sinθ,
cosθ × secθ = 1,
cosθ = 1 / secθ,
secθ = 1 / cosθ,
tanθ × cotθ = 1,
tanθ = 1 / cotθ,
cotθ = 1 / tanθ,
कोण यानि Angle के रूप में प्रयोग की जाने वाली ग्रीक शब्द
α = अल्फ़ा,
β = बीटा,
γ = गामा,
δ = डेल्टा,
λ = लैम्डा,
Ψ = साई,
0 = थीटा,
ρ = रो,
Φ = फाई,
1. sinA या sin0 एक संकेत हैं तथा sin को A या θ से अलग नहीं किया जा सकता। यहाँ यह sin x 0 के बराबर नहीं है। यही अन्य त्रिकोणमितिय अनुपातों पर भी लागू होता है।
2. प्रत्येक त्रिकोणमितिय अनुपात एक वास्तविक संख्या है।
3. सुविधा के लिए हम (sinθ)², (cosθ)², और (tanθ)² को क्रमशः sin²θ, cos²θ तथा tan²θ द्वारा व्यक्त करते हैं। यही संकेत हम त्रिकोणमितिय अनुपातों के बड़े घातांकों के लिए अपनाते हैं। sin²θ , sinθ² दोनों में अन्तर हैं एक अनुपात का वर्ग है तथा दुसरा कोण का वर्ग है ।
जब दो व्यंजकों को चिन्ह '=' से मिलाया जाए, तो हमें एक समीकरण प्राप्त होता है।
हम दो व्यंजकों को समानता के चिन्ह से जोड़ते हैं तो हमें सर्वसमिका प्राप्त होती है।
जब हम यह कहते हैं कि दो व्यंजकों को चिन्ह '=' से जोड़ने पर समीकरण या सर्वसमिका प्राप्त होती है तो दोनों में क्या अन्तर है।
दोनों में मुख्य अंतर यह है कि चर में समीकरण चर के कुछ मानों के लिए सत्य होता है जबकि चर में वह समीकरण जो चर के प्रत्येक मान के लिए सत्य होता है, सर्वसमिका कहलाता है।
त्रिकोणमितिय सर्वसमिकाएँ
लम्ब, कर्ण का sinθ गुणा होता है, BC = ACxsinθ
इसी प्रकार आधार , कर्ण का cosθ गुणा होता हैं, AB = ACxcosθ
यानि किसी समकोण त्रिभुज ABC में , पाइथागोरस प्रमेय द्वारा (लम्ब)² + (आधार)² = (कर्ण)²
BC² + BA² = AC²
AC²xsin²θ + AC²xcos²θ = AC²
AC²(sin²θ + cos²θ ) = AC²
दोनों तरफ AC² काॅमन है , इसलिए AC² का दोनों तरफ भाग देने पर
(sin²θ + cos²θ ) = 1
उपरोक्त सर्वसमिका सभी त्रिकोणमितिय अनुपातों के लिए लागू होती है और यह पहली सर्वसमिका कहलाती है।
इसी प्रकार हम और भी त्रिकोणमितिय सर्वसमिकाए ज्ञात कर सकते है, और हमारी आवश्यकता के अनुसार इनको लिखा जा सकता है जो निम्नानुसार है।।
sin²θ + cos²θ = 1
sin²θ = 1 – cos²θ
cos²θ = sin²θ – 1
sinθ = √(1 – cos²θ)
cosθ = √( sinθ – 1 )
1 + tan²θ = sec²θ (मूल सर्वसमिका में sin²θ का दोनों तरफ भाग देनें पर )
tan²θ = sec²θ – 1
tanθ = √(sec²θ – 1)
secθ = √(1 + tan²θ)
cosec²θ = cot²θ + 1 (मूल सर्वसमिका में cos²θ का दोनों तरफ भाग देनें पर )
cot²θ = cosec²θ – 1
cosecθ = √(cot²θ + 1)
cot²θ = √(cosec²θ – 1)
पूरक कोणों के लिए त्रिकोणमितिय अनुपात
ज्यामिति में, हमने पूरक तथा सम्पूरक कोणों के बारे में पढ़ा है, कि दो कोण पूरक होते हैं यदि उनका जोड़ 90° है। यदि दो कोणों A तथा B का योग 90° हो, तो ∠A तथा ∠B पूरक कोण होते हैं तथा प्रत्येक कोण, दूसरे कोण का पूरक होता है।
इस प्रकार 20° तथा 70° के कोण पूरक कोण हैं। 20° का कोण 70° के कोण का पूरक है तथा विलोमतः 70° का कोण 20° के कोण का पूरक है।
sin(90°−θ) = cos θ
cos(90°−θ) = sin θ
tan(90°−θ) = cot θ
cot(90°−θ) = tan θ
sec(90°−θ) = Cosec θ
Cosec(90°−θ) = sec θ
90°−θ, θ का योग 90° है इसलिए 90°−θ, θएक दूसरे के पूरक कोण है।
अर्थात जो मान cos50° का होग वही मान sin40° का होगा (50°+ 40°= 90°)।
π/2 = 90°
sin (π/2 – A) = cos A
cos (π/2 – A) = sin A
कुछ विशेष कोणों के त्रिकोणमितिय अनुपात
त्रिकोणमिति के अनुप्रयोग
हमने एक कोण के त्रिकोणमितीय अनुपातों को परिभाषित करना सीखा है। हमने 30°, 45° तथा 60° के कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपातों का मान ज्ञात करना भी सीखा है। हम 0° तथा 90° के कोणों के उन त्रिकोणमितीय अनुपातों को भी जानते हैं जो अच्छी प्रकार से परिभाषित हैं।
हम त्रिकोणमिति का प्रयोग दो वस्तुओं के बीच की दूरी या वस्तुओं की ऊँचाई ज्ञात करने में, करना सीखेंगे।
सबसे पहले हम कुछ विशेष शब्दों को परिभाषित करेगे जिनकी हमें ऊँचाइयों और दूरियों के अध्ययन करने के लिए आवश्यकता पड़ेगी।
उन्नयन कोण
-यदि प्रेक्षक, एक वस्तु P जो प्रेक्षक A से अधिक ऊँचाई पर है, को देखता है, तो उस वस्तु को देखने के लिए अपनी आंखों को ऊपर उठाना होगा तथा प्रेक्षक की आँख को वस्तु से मिलाने वाली दृष्टि रेखा तथा क्षैतिज रेखा के बीच जो कोण बनता है, उन्नयन कोण कहलाता है। आकृति में, A प्रेक्षक है, P वस्तु है, AP दृष्टि रेखा तथा AB क्षैतिज रेखा है। 20 उन्नयन कोण है।
अवनमन कोण
- जब प्रेक्षक A जो अधिक ऊँचाई पर है, वस्तु P (जो कम ऊँचाई पर है) को देखता है तो दृष्टि रेखा और क्षैतिज रेखा के बीच बनने वाला कोण अवनमन कोण कहलाता है। आकृति में, AP दृष्टि रेखा तथा AK क्षैतिज रेखा है। यहाँ α अवनमन कोण है। ∠KAP = ∠APB एकान्तर कोण है।
यदि प्रश्न में कथन दिया हुआ है तो कथन से पहले एक या आवश्यकतानुसार हम समकोण त्रिभुज बनायेगें। फिर कथन में दिये गये शब्दों से हम कर्ण, लम्ब, आधार का मान लिखेंगें, समकोण त्रिभुज के न्यून कोण लिखेंगें, तत्पशचत हम अज्ञात कोण या भुजा का मान ज्ञात करेंगें।
कुछ शब्द जो कर्ण, लम्ब, आधार होंगें
लम्ब - खम्बा, पेड़, दीवार, मीनार, लम्बवत, लम्बी, उर्ध्वाधर, ऊँचाई आदि
आधार- जमीन, क्षैतिज, दो भवनों के बीच की दूरी, पाद से दूरी, दीवार से दूरी, पेड़ से दूरी, अर्थात दूरी, परछाई, आदि
कर्ण - पतंग की डोर, टुटे पेड़ की डाली, नीचे से उपर देखना या उपर से नीचे देखना,सीढ़ी, लम्बाई, तिरछा आदि

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